पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥

शब्दार्थ

पुण्यः – मूल, आद्य; गन्धः – सुगंध; पृथिव्याम् – पृथ्वी में; – भी; तेजः – प्रकाश; – भी; अस्मि – हूँ; विभावसौ – अग्नि में; जीवनम् – प्राण; सर्व – समस्त; भूतेषु – जीवों में; तपः – तपस्या; – भी; अस्मि – हूँ; तपस्विषु – तपस्वियों में ।

भावार्थ

मैं पृथ्वी की आद्य सुगंध और अग्नि की ऊष्मा हूँ । मैं समस्त जीवों का जीवन तथा तपस्वियों का तप हूँ ।

तात्पर्य

पुण्य का अर्थ है - जिसमें विकार न हो, अतः आद्य । इस जगत् में प्रत्येक वस्तु में कोई न कोई सुगंध होती है, यथा फूल की सुगंध या जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु आदि की सुगंध । समस्त वस्तुओं में व्याप्त अदूषित भौतिक गन्ध, जो आद्य सुगंध है, वह कृष्ण हैं । इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु का एक विशिष्ट स्वाद (रस) होता है और इस स्वाद को रसायनों के मिश्रण द्वारा बदला जा सकता है । अतः प्रत्येक मूल वस्तु में कोई न कोई गन्ध तथा स्वाद होता है । विभावसु का अर्थ अग्नि है । अग्नि के बिना न तो फैक्टरी चल सकती है, न भोजन पक सकता है । यह अग्नि कृष्ण है । अग्नि का तेज (ऊष्मा) भी कृष्ण ही है । वैदिक चिकित्सा के अनुसार कुपच का कारण पेट में अग्नि की मंदता है । अतः पाचन तक के लिए अग्नि आवश्यक है । कृष्णभावनामृत में हम इस बात से अवगत होते हैं कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा प्रत्येक सक्रिय तत्त्व, सारे रसायन तथा सारे भौतिक तत्त्व कृष्ण के कारण हैं । मनुष्य की आयु भी कृष्ण के कारण है । अतः कृष्ण की कृपा से ही मनुष्य अपने को दीर्घायु या अल्पजीवी बना सकता है । अतः कृष्णभावनामृत प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय रहता है ।